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महिला एवं बाल अपराध

“स्वयं, किसी व्यक्ति, समूह या समुदाय के विरुद्ध उन्हें किसी प्रकार के मानसिक या शारीरिक चोट पहुंचाने के लिए जान-बूझकर किये गए शक्ति के प्रयोग” को हिंसा कहते हैं। “जान बूझ कर किया गया कोई भी ऐसा काम जो समाज विरोधी हो या किसी भी प्रकार से समाज द्वारा निर्धारित आचरण का उल्लंघन अथवा जिसके लिए दोषी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी) के अंतर्गत कानून द्वारा निर्धारित दंड दिया जाता हो” ऐसे काम अपराध कहलाते हैं।

उपयुर्क्त परिभाषा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिंसा और अपराध दोनों एक दूसरे से सीधा संबंध है। ऐसी कोई भी क्रिया-कलाप जिससे किसी व्यक्ति विशेष या समूह, समुदाय की भावनाएं और स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े और व्यवस्थाओं में आवांछित प्रभाव पड़े, वे सभी हिंसा और अपराध के श्रेणी में रखे जायेंगे।

अपराध जंगल में लगने वाले आग की तरह है, जिसे समय पर न रोका जाए तो, आने वाले समय में यह विध्वंसकारी रूप धारण कर लेती है और यह समूचे मानव जाति के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सकती है ।

महिला सम्बंधित अपराध

महिलाओं से सम्बंधित अपराधों की श्रेणी में उनके शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, यौन एवं भावनात्मक उत्पीड़न/ शोषण से सम्बंधित अपराध प्रायः भारतीय समाज में देखे जाते हैं। महिलाओं पर होने वाले अपराध चैंकाने वाले हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, प्रति वर्ष महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के लगभग 3 लाख से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं, जिनमें छेड़छाड़, मार-पीट, अपहरण, दहेज उत्पीड़न से लेकर बलात्कार एवं मृत्यु तक के मामले शामिल हैं।

उपुर्युक्त महिला सम्बंधित अपराधों को रोकने, उनसे निपटने तथा उन अपराधों से महिलाओं के संरक्षण के लिए बनाए गए कानून निम्नलिखित हैंः

सर्वप्रथम वर्ष 1950 में, भारतीय संविधान में बच्चों एवं महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान दिया गया। भारतीय संविधान राज्य को यह अधिकार देता है, कि वह स्त्रियों और बालकों के कल्याण के लिए विशेष उपाय कर सकता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 - भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी)1860 एक व्यापक कानून है जो भारत में आपराधिक कानून के वास्तविक पहलुओं को शामिल करता है। यह भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये गए अपराधों के बारे में बताता है एवं उनमें से प्रत्येक के लिए सजा और जुर्माना बताता है। भारतीय दंड संहिता पूरे भारत में लागू है।

इस संहिता में महिलाओं को विशेषाधिकार प्राप्त हैं। भारतीय दंड संहिता की धारा 354- स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग, धारा 354-ए- यौन उत्पीड़न के लिए सजा, धारा 354-बी- बल पूर्वक या हमले द्वारा किसी स्त्री को नग्न करना या नग्न होने के लिए विवश करना, धारा 354 सी- तांक-झांक करना, धारा 354-डी पीछा करना एवं धारा 509- शब्द, अंगविक्षेप या कार्य जो किसी स्त्री की लज्जा का अनादर करने के लिए आशयित है। इन सभी धाराओं में महिला के होने वाले अपराधों के लिए कठोर कारावास की सजा या जुर्माना या दोनों लगायें जा सकते हैं। इसका उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा एवं गरिमा को सुरक्षित करना है।

भारतीय दण्ड संहिता संशोधित अधिनियम 2018 - देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों (खास कर यौन उत्पीड़न) के लिए सख्त सजा सुनिश्चित करने के लिए देश भर में ये कानून लागू किया गया है। नए कानून में बलात्कार की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए इसके लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। बलात्कार के मामले में पीड़ित की मौत हो जाने या उसके स्थायी रूप से मृतप्राय हो जाने की स्थिति में मौत की सजा का प्रावधान भी इस कानून में किया गया है। सामूहिक बलात्कार की स्थिति में दोषियों के लिए धारा 376 डी के तहत सजा की अवधि न्यूनतम 20 वर्ष रखी गयी है, जो आजीवन कारावास तक हो सकती है ? कानून में सहमति से यौन सम्बन्ध बनाने की उम्र 18 साल तय की गयी है। महिलाओं का पीछा करने एवं तांक-झाँक पर कड़े दंड का प्रावधान है। ऐसे मामले में पहली बार में गलती हो सकती है, इसलिए इसे जमानती रखा गया है, लेकिन दूसरी बार ऐसा करने पर इसे गैर जमानती बनाया गया है । तेजाबी हमला करने वालों के लिए 10 वर्ष की सजा का भी कानून में प्रावधान किया गया है। इसमें पीड़ित को आत्मरक्षा का अधिकार प्रदान करते हुए, तेजाब हमले की अपराध के रूप में व्याख्या की गयी है । साथ ही यह प्रावधान किया गया है कि सभी अस्पताल बलात्कार या तेजाब हमला पीड़ितों को तुरंत प्राथमिक सहायता या निशुल्क उपचार उपलब्ध करायेंगे और ऐसा करने में विफल रहने पर उन्हें सजा का सामना करना पड़ेगा। कानून में कम से कम 7 साल की सजा का प्रावधान है, जो प्राकृतिक जीवन-काल तक के लिए बढ़ाई जा सकती है और यदि दोषी व्यक्ति पुलिस अधिकारी, लोकसेवक, शस्त्र बलों या प्रबंधन या अस्पताल का कर्मचारी है तो उसे जुर्माने का भी सामना करना पड़ेगा। कानून में भारतीय साक्ष्य अधिनियम में संशोधन किया गया है जिसके तहत बलात्कार पीड़िता को, यदि वह अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो जाती है तो उसे अपना बयान दुभाषियों या विशेष एजुकेटर की मदद से न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराने की अनुमति दी गयी है। ये अधिनियम संशोधित भारतीय दंड संहिता का एक अंग हैं।

दंड प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी) 1973 - दंड प्रक्रिया संहिता 1973 भारत में आपराधिक कानून के क्रियान्वयन के लिए मुख्य कानून है। 1973 में पारित होकर यह कानून 1974 में लागू हुआ। दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत, हमेशा दो प्रक्रियाएं होती हैं, जिन्हें पुलिस अपराध की जांच करने में अपनाती है। एक प्रक्रिया पीड़ित के सम्बन्ध में और दूसरी आरोपी के सम्बन्ध में। दंड प्रक्रिया संहिता/ सी.आर.पी.सी में इन दोनों प्रक्रियाओं का ब्यौरा दिया जाता है। इस कानून की धारा 376 बलात्कार से संबंधित है।

दहेज निषेध अधिनियम 1961 (संशोधित 1986) - दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 को दहेज (निषेध) अधिनियम 1984 और 1986 के अंतर्गत दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करना दोनों अपराध है। दहेज लेने-देने, या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रूपये के जुर्माने का प्रावधान है।

दहेज लेने और देने या दहेज लेने और देने के लिए उकसाने पर या तो 6 महीने का अधिकतम कारावास है या 5000 रूपये तक का जुर्माना अदा करना पड़ता है। बाद में संशोधन अधिनियम के द्वारा इन सजाओं को भी बढाकर न्यूनतम 6 महीने और अधिकतम दस साल की कैद की सजा तय कर दी गयी है। वहीँ जुर्माने की रकम को बढ़ाकर 10,000 रूपये, ली गयी, दी गयी या मांगी गयी दहेज की रकम, दोनों में से जो भी अधिक हो, के बराबर कर दिया गया है। हालाँकि अदालत ने न्यूनतम सजा को कम करने का फैसला किया है लेकिन ऐसा करने के लिए अदालत को जरूरी और विशेष कारणों की आवश्यकता होती है (दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4) दंडनीय है- दहेज देना, दहेज लेना, दहेज लेने और देने के लिए उकसाना एवं वधु के माता-पिता या अभिभावकों से सीधे या परोक्ष तौर पर दहेज की मांग करना।

भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए निर्ममता तथा दहेज के लिए उत्पीड़न, 304 बी इससे होने वाली मृत्यु और 306 भादसं(भारतीय दंड संहिता)- उत्पीड़न से तंग आकर महिलाओं द्वारा आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाली घटनाओं से निपटने के लिए कानूनी प्रावधान है ।

यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के अंतर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।

अधिनियम से जुडी प्रमुख धाराएं:

धारा 2- दहेज का मतलब है कोई सम्पति या बहुमूल्य प्रतिभूति देना या देने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से

धारा 3-दहेज लेने या देने का अपराध

धारा 4-दहेज की मांग के लिए जुर्माना

धारा 4ए- किसी भी व्यक्ति द्वारा प्रकाशन या मिडिया के माध्यम से पुत्र-पुत्री के शादी के एवज में व्यवसाय या सम्पत्ति या हिस्से का कोई प्रस्ताव

धारा 6- कोई दहेज विवाहिता के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति द्वारा धारण किया जाना

धारा 8ए- घटना से एक वर्ष के अन्दर शिकायत

धारा 8बी- दहेज निषेध पदाधिकारी की नियुक्ति

2009 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस अधिनियम में कुछ परिवर्तन प्रस्तावित किये थे। जिसके अनुसार, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के लिए नियुक्त किये गए सुरक्षा अधिकारियों को दहेज सुरक्षा अधिकारियों के दायित्व भी निभाने के लिए अधिकृत किया जाए।

महिला जहाँ कहीं भी स्थायी या अस्थायी तौर पर रह रही है वहीँ से दहेज की शिकायत दर्ज करने की अनुमति दी जाए।

स्त्री अशिष्ट रूप प्रतिषेध अधिनियम 1986- भारत की संसद का एक अधिनियम है, जिसे विज्ञापन, प्रकाशन, लेखन चित्रों, आंकड़ों या किसी अन्य तरीके से महिलाओं के अश्लील प्रतिनिधत्व पर रोक लगाने के लिए लागू किया गया है। जिसके लिए -

प्रथम बार अपराध करने पर 02 वर्ष तक की अवधि का कारावास तथा रू. 02 हजार का जुर्माना

ऐसे अपराध की पुनरावृत्ति करने पर न्यूनतम 06 माह से 05 वर्ष तक का कारावास तथा न्यूनतम रू. 10000- से रू. 01 लाख तक का जुर्माना।

इसके खिलाफ किसी भी व्यक्ति द्वारा निम्नलिखित जगहों पर शिकायत करवाई जा सकती है:

नजदीकी पुलिस स्टेशन

जिला न्यायालय

उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास से कर सकती है

तहसील जिला राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से निःशुल्क परामर्शध्विधिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं।

उपरोक्त में किसी से भी स्वयं माता-पिता या अन्य रिश्तेदार या सरकार द्वारा मान्य कोई समाज सेवी संस्था के माध्यम से शिकायत दर्ज करायी जा सकती है या फिर टोल फ्री नं. पर कॉल कर सकते हैं।

सती (रोकथाम) अधिनियम 1987 - यह सती प्रथा को रोकने एवं स्त्रियों की सुरक्षा के लिए 1987 में राजस्थान सरकार द्वारा लागू एक कानून है। यह 1988 में द कमीशन ऑफ सती (रोकथाम) अधिनियम, 1987 के अधिनियमन के साथ भारत की संसद का एक अधिनियम बन गया। सती को पहली बार बंगाल सती विनियमन, 1829 के तहत प्रतिबंधित किया गया था।

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 - भारत की संसद द्वारा पारित अधिनियम है, जिसका उद्देश्य घरेलु हिंसा से महिलाओं को बचाना है। यह 26 अक्टूबर 2006 को लागू हुआ।

किसी भी महिला के साथ किये गए, किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक या लैंगिक दुर्व्यवहार या किसी भी प्रकार का शोषण जिससे महिला की गरिमा का उल्लंघन, अपमान या तिरस्कार हो, या वित्तीय साधन जिसकी वो हकदार है, से वंचित करना ये सभी कृत्य घरेलु हिंसा की श्रेणी में आते हैं।

इसमें 5 अध्याय और 37 धाराएं है।

अध्याय-1 - प्रस्तावना/प्रारंभिक - धारा 1 व धारा 2

अध्याय-2 - घरेलु हिंसा परिभाषा - धारा 3

अध्याय-3 - संरक्षण अधिकारी व सेवा प्रदाता के अधिकार व कर्तव्य - धारा 4 से 11

अध्याय-4 - राहत के आदेश प्राप्त करने की प्रक्रिया - धारा 13 से 29

अध्याय-5 - विविध - धारा 30 से 37

अधिनियम से संबंधित महत्वपूर्ण धाराएं और उनके प्रावधान

धारा-3: घरेलु हिंसा की परिभाषा

धारा-4: घरेलु हिंसा की सूचना संरक्षण अधिकारी को प्रस्तुत करना।

धारा-5: संरक्षण अधिकारी के द्वारा महिला को उसके अधिकारों की जानकारी देना।

धारा-8: संरक्षण अधिकारी

धारा-10: सेवा प्रदाता

धारा-12: मजिस्ट्रेट के द्वारा केस पारित के तीन दिनों के भीतर सुनवाई की तारिख निश्चित करना और उसे 60 दिनों में पुरा करना।

धारा-14: सेवा प्रदाता से परामर्श लेना।

धारा-16: यदि पक्षकार चाहे तो सुनवाई बंद कमरे में भी कर सकते हैं।

धारा-17व18: संयुक्त निवास प्राप्त करने का अधिकार

धारा-19: महिला व उसके बालक के भरण-पोषण का अधिकार

धारा-20: क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार

धारा-24: न्यायालय के आदेश की काॅपि पक्षकारों को निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 - वर्ष 2013 में पारित इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी ऐसी संस्था जिसमें 10 या 10 से अधिक लोग काम करते हैं, वहाॅ आन्तरिक परिवाद समिति का गठन किया गया है। ऐसी संस्थाओं में महिला के साथ हुए किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न को एक अपराध माना गया है। ये अधिनियम विशाखा केस में दिए गए लगभग सभी निर्देशों को धारण एवं प्रावधानों को निहित करता है। जैसे शिकायत समितियों को सबूत जुटाने में सिविल कोर्ट वाली शक्तियां प्रदान की हैं, यदि नियोक्ता अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने में असफल होता है तो उसे 50,000 रूपये तक का अर्थदंड भरना पड़ेगा। ये अधिनियम किसी भी महिला कर्मचारी, ग्राहक, उपभोक्ता, प्रशिक्षु और दैनिक मजदूरी पर कार्यस्थल में प्रवेश करने वाली या तदर्थ क्षमता में काम करने वाली महिलाओं को यह कानून सुरक्षा प्रदान करता है । इसके अतिरिक्त, कॉलेजों/ विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों, शोध छात्रों और अस्पतालों में रोगियों को भी कवर किया गया है।

पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (PCPNDT) अधिनियम 1994 - भारत में कन्या भू्रण हत्या और गिरते लिंगनुपात को रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पारित एक संघीय कानून है। भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से जन्म पूर्व लिंग निर्धारण के प्रति अपना विरोध व्यक्त किया, जिसके फलस्वरूप दिनांक 1.1.96 को प्रसव पूर्व निदान तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम, 1994 लागू कर ऐसी जॉचों को कानूनी अपराध ठहराया है।

गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 - कानून में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि केवल सरकार द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त अस्‍पतालों में ही गर्भ समापन सेवायें प्राप्‍त की जा सकती हैं इन अस्‍पतालों में पूरी सुविधायें होने पर ही इन्‍हें इस काय्र के लिए अधिकृत किया जाता है।

अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 - इस अधिनियम के अनुसार 18 वर्ष का कोई भी व्यक्ति नाबालिग है। यह अधिनियम व्यवसायिक यौन उत्पीड़न (वैश्यावृत्ति) के उद्देश्यों से किये जाने वाले व्यापार की रोकथाम एवं इससे सुरक्षा प्रदान करता है। वैश्यावृत्ति करने या उसके लिए फुसलाने/ याचना करने के सम्बन्ध में दोषी महिला को उसके मानसिक या शारीरिक स्थिति के आधार पर न्यायालय उसको सुधार संस्था में भी भेजने का आदेश दे सकती है।

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम के अंतर्गत बाल एवं महिला विशेष निम्नलिखित कार्य अपराध हैं -

अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे या नाबालिग द्वारा की गई वेश्यावृत्ति की कमाई पर रहता है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 7 साल व अधिक से अधिक 10 साल की जेल हो सकती है।

18 साल से कम उम्र की लड़की को गैर कानूनी संभोग के लिए फुसलाना (धारा-366-क) -यदि कोई व्यक्ति किसी 16 साल से कम उम्र की लड़की को फुसलाता है, किसी स्थल से जाने को या कोई कार्य करने को यह जानते हुए कि उसके साथ अन्य व्यक्ति द्वारा गैर कानूनी संभोग किया जाएगा या उसके लिए मजबूर किया जाएगा तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।

विदेश से लड़की का आयात करना (धारा 366-ख)- अगर कोई व्यक्ति किसी 21 साल से कम उम्र की लड़की को विदेश से या जम्मू कश्मीर से लाता है, यह जानते हुए कि उसके साथ गैर कानूनी संभोग किया जाएगा या उसके लिए मजबूर किया जाएगा तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।

वेश्यावृत्ति आदि के लिए बच्चों को बेचना (धारा-372)- अगर कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वेश्यावृत्ति, या गैर कानूनी संभोग, या किसी कानून के विरूद्ध और दुराचारिक काम में लाए जाने या उपयोग किए गए जाने के लिए उसको बेचता है या भाड़े पर देता, तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र की लड़की को किसी वेश्या या किसी व्यक्ति को, जो वेश्यागृह चलाता हो या उसका प्रबंध करता हो, बेचता है, भाड़े पर देता है तो यह माना जाएगा कि उस व्यक्ति ने लड़की को वेश्यावृत्ति के लिए बेचा है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।

वेश्यावृत्ति आदि के लिए बच्चों को खरीदना (धारा 373) -अगर कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वेश्यावृत्ति, या गैर कानूनी संभोग, या किसी कानून के विरूद्ध, और दुराचारिक काम में लाए जाने या उपयोग किए जाने के लिए उसको खरीदता है या भाड़े पर देता है, तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल की जेल और जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।

इस अधिनियक के अंदर दिए गए सभी अपराध संज्ञेय हैं -

इस अधिनियम के अंदर दिए गए अपराध के दोषी व्यक्ति को विशेष पुलिस अधिकारी या उसके निर्देश के बिना, वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है।

मानव तस्करी (रोकथाम, सुरक्षा व पुनर्वास) बिल, 2018 - महिला व बाल विकास मंत्रालय द्वारा 18 जुलाई, 2018 को लोकसभा में यह बिल पेश हुआ जो 26 जुलाई, 2018 को एक सदन में पारित हो गया। एक सदन में पारित इस बिल में सभी तरीकों से तस्करी की जांच करने के लिए और तस्करी पीड़ितों के बचाव, सुरक्षा व पुनर्वास के नियम स्थापित करने का प्रावधान है।

बालकों से सम्बंधित अपराध

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2015 -16 के अनुसार भारत में बच्चों के प्रति होने वाले अपराध जैसेय बाल श्रम, बाल व्यापार, अपहरण, शारीरिक-मानसिक हिंसा, यौन शोषण, बलात्कार आदि के मामलों में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी हुई है। ये अपराध घर, स्कूलों, अनाथालयों, आवास-गृहों, सड़क, कार्यस्थल, जेल, सुधार-गृह आदि किसी जगह पर, किसी के भी द्वारा हो सकते हैं। बालकों के साथ अपराध करने वाला, जान-पहचान से लकर अनजान तक कोई भी हो सकता है।

बाल संरक्षण के लिए बनाए गए कानून निम्नलिखित हैंः

बालक एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियम) अधिनियम, 1986 - इस अधिनियम की धारा 3 के तहत 14 वर्ष तक की आयु वर्ग तक के बालक से किसी भी प्रकार का खतरनाक एवं गैर खतरनाक कार्य कराना संज्ञेय अपराध है।

श्रम मंत्रालय में केंन्द्रीय औद्योगिक संबंध तंत्र (सीआईआरएम) इस अधिनियम को लागू करने के लिए जिम्मेदार है। सीआईआरएम मंत्रालय का सम्बद्ध कार्यालय है और इसे मुख्य श्रम आयुक्त (केन्द्रीय) सीएलसी (सी) संगठन के नाम से भी जाना जाता है। सीआईआरएम के प्रमुख आयुक्त (केन्द्रीय) है। इसके अतिरिक्त मौजूदा विनियमों के कार्यान्वयन की समीक्षा करने और कामकाजी बच्चों के कल्याण हेतु उपायों का सुझाव देने के लिए मंत्रालय के अंतर्गत केन्द्रीय बाल श्रम सलाहकार बोर्ड भी गठित किया गया है।

बाल श्रम के ऐसे केस जिसमें बच्चों के बंधुआ मजदूर के सामान स्थिति में पाए जाने पर बाल श्रम से सम्बंधित अपराधों में केस/प्रकरण को और मजबूत करने के लिए बंधुआ मजदूर प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976 को भी लगाया जाता है।

बाल श्रम (निषेध एवं नियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के अनुसार बच्चों को दो श्रेणियों में बांटा गया हैः

एक ऐसा व्यक्ति, जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो, 14 वर्ष तक की आयु के किसी भी बच्चे को कहीं भी रोजगार पर नहीं लगाया जा सकता है।

एक ऐसा व्यक्ति, जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी की हो, लेकिन 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो, ऐसे बालक को किसी भी खतरनाकध् जोखिम वाले व्यवसायों या प्रक्रियाओं में काम पर नहीं लगाया जाना चाहिए और खतरनाक कार्य करने की अनुमति भी नहीं देनी चाहिए।

बाल श्रम से जुड़े अनुच्छेद

अनुच्छेद-23: बालश्रम व मानव व्यापर का निषेध

अनुच्छेद-24: खतरनाक गतिविधियों में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की नियुक्ति निषेध

अनुच्छेद-34: बालकों के विकास की नैतिक जिम्मेदारी सरकार की होगी

अनुच्छेद-21ए: 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार

बच्चों से सम्बन्धित भारतीय दण्ड संहिता की धाराएं

धारा-82: इस धारा के अनुसार 0 से 7 वर्ष की आयु वर्ग वाले बालक द्वारा कोई भी किया गया अपराध अपराध की श्रेणी में नहीं माना जायेगा क्योंकि इस वर्ष तक के बच्चे की मानसिक क्षमता इतनी व्यापत नहीं होती कि वह समझ पाये कि अपराध क्या होता है।

धारा-83: इस धारा के अनुसार 0 से 12 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों द्वारा यदि कोई अपराध किया जाए तो उसे अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं करेंगे यदि बालक मानसिक रूप से विकृत है।

धारा-305: किसी भी बालक द्वारा आत्महत्या व आत्मदाह का प्रयास करना अपराध माना जायेगा। सजा 7 साल।

धारा-326: किसी व्यक्ति द्वारा किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ तेजाब आदि से किसी भी व्यक्ति पर हमला करना अपराध माना जायेगा। सजा 10 वर्ष।

धारा-326ए: इस धारा के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति यदि जानबुझकर तेजाब या किसी अन्य रासायनिक पदार्थ से हमला करता है तो कानून संशोधन अधिनियम 2005 के अनुसार आजीवन कारावास का प्रावधान है।

धारा-326बी: यदि किसी व्यक्ति द्वारा तेजाब इत्यादि से हमला करने का प्रयास किया जाता है तो न्यूनतम 3 वर्ष, अधिकतम 7 वर्ष सजा का प्रावधान है।

धारा-369: इस धारा के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी शिशु का अपहरण इस उद्देश्य से किया गया हो कि शिशु का कोई भी शारीरिक अंग चुराया जाए तो यह अपराध होगा। सजा- 5 वर्ष।

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के धारा (बी) के तहत यदि कोई विवाहित जोड़े में से कोई भी एक नाबालिग है, तो इसे बाल विवाह माना जाता है। 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 से कम उम्र के लड़के को इस अधिनियम के तहत नाबालिग माना गया है। इसका अर्थ है कि विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु लड़की के लिए 18 और लड़के के लिए 21 वर्ष है।

केन्द्र सरकार द्वारा 1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त करके और उसके स्थान पर 2006 में अधिक प्रगतिशील बाल विवाह निषेध अधिनियम लाकर हाल के वर्षों में इस प्रथा को रोकने की दिशा में काम किया गया है। इसके अंतर्गत उन लोगों के खिलाफ कठोर उपाय किये गये हैं जो बाल विवाह कि इजाजत देते हैं और उसे बढ़ावा देते हैं। यह कानून नवम्बर 2007 में प्रभावी हुआ।

इस कानून के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति, अठारह वर्ष से अधिक आयु का पुरुष वयस्क होते हुए, बाल-विवाह करेगा, वह, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा।

यौन शोषण से बच्चों की सुरक्षा का अधिनियम ( पोक्सो एक्ट), 2012- बालकों के प्रति बढ़ते हुए अपराधों के समुचित उपचार एवं नियंत्रण के लिए लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो एक्ट) लाया गया। 14 नवम्बर, 2012, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012, (पोक्सो एक्ट) लागू किया गया। इस कानून में बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए पुलिस के स्तर पर शिकायत दर्ज कराने तथा न्यायायिक प्रक्रिया को बाल मैत्रीपूर्ण बनाने का प्रयास किया गया है । इस कानून के द्वारा न सिर्फ बच्चों के प्रति होने वाले कई तरह के यौन/ लैंगिक अपराधों को कानून के दायरे में लाया गया है, साथ ही इन अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से बच्चों के प्रति यौन हमला, यौन शोषण/ उत्पीड़न, अश्लीलता, गोपनीयता आदि को शामिल किया गया है। बच्चों के प्रति होने वाले यौन अपराधों के प्रति माता-पिता, स्कूल, को-पड़ोसी, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस, मीडिया, सामाजिक एवं सरकारी संगठनों की महत्तवपूर्ण भूमिका है। सामुदायिक स्तर पर इनके सामुहिक प्रयास के बिना अपेक्षित परिणाम लाना चुनौतीपूर्ण है

प्रवेशन लैंगिक हमला (धारा 3)

एक व्यक्ति जब अपना लिंग किसी भी सीमा तक किसी बच्चे की योनि, मूंह, मूत्रमार्ग या गुदा में प्रवेश करता है या बच्चे से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाता है या

किसी वस्तु या शरीर के ऐसे भाग को, जो लिंग नही है, किसी सीमा तक बच्चे की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा में डालता है या बालक से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ करवाता है या

बालक के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर अपना मूंह लगाता है या ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति के साथ बालक के साथ ऐसा करवाता है।

प्रवेशन लैंगिक हमला (धारा 4)

जो कोई प्रवेशन लैंगिक हमला करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 7 वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

गुरुत्तर प्रवेशन लैंगिक हमला में शामिल है: (धारा 5)

यदि कोई लोक सेवक होते हुए बच्चे पर प्रवेशन लैंगिक हमला करता है ।

लैंगिक हमला (धारा 6) - जो कोई गुरूतर प्रवेषन लैंगिक हमला करेगा वह कठोर कारावास से जिसकी अवधि 10 वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु वह आजीवन कारावास तक हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

लैंगिक हमला (धारा 7)

जो कोई, लैंगिक आशय से बालक की योनि, लिंग, गुदा या स्तनों को स्पर्श करता है या बालक से ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति की योनि, लिंग, गुदा या स्तनों को स्पर्श कराता है या लैंगिक आशय से ऐसा कोई अन्य कार्य करता है जिसमें प्रवेशन किये बिना शारीरिक अन्तग्रस्त होता है, लैंगिक हमला करता है यह कहा जाता है।

लैंगिक हमला (धारा 8) - जो कोई लैंगिक हमला करेगा वह दोनों मे से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम नहीं किन्तु 5 वर्ष तक हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

लैंगिक उत्पीड़न (धारा 11)

कोई शब्द कहता है या कोई ध्वनि या अंगविक्षेप करता है या कोई वस्तु या शरीर का भाग इस आशय के साथ प्रदर्शित करता है कि बालक द्वारा ऐसा शब्द या ध्वनि सुनी जाएगी या ऐसा अंगविक्षेप या वास्तु या शरीर का भाग देखा जायेगा या

जो कोई, किसी बालक का, मीडिया के (जिसमें टीवी चैनलों या इंटरनेट या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक प्रारूप या मुद्रित प्रारूप द्वारा प्रसारित कार्यक्रम या विज्ञापन का आशय व्यक्तिगत उपयोग या वितरण के लिए हो या नहीं सम्मलित है) किसी प्रारूप में ऐसे लैंगिक परितोषण के प्रयोजनों के लिए उपयोग करता है, जिसमें निम्नलिखित सम्मलित हैः

लैंगिक उत्पीडन के लिए दण्ड (धारा 12) - जो कोई किसी बालक पर लैंगिक उत्पीडन करेगा वह दोनों में किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 3 वर्ष तक हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

बालक का अश्लील प्रयोजनों के लिए (धारा 13)

किसी बालक की जनेंद्रियों का प्रदर्शन करना

किसी बालक का उपयोग वास्तविक या नकली लैंगिक कार्यों में (प्रवेशन के साथ या उसके बिना) करनाय

किसी बालक का अशोभनीय या अश्लीलतापूर्ण प्रतिदर्शन करना

वह किसी बालक का अश्लील प्रयोजनों के लिए उपयोग करने के अपराध का दोषी होगा।

लैंगिक उत्पीड़न (धारा 14):- जो कोई अश्लील प्रयोजन के लिए किसी बालक या बालको का उपयोग करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 5 वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा या पश्चातवर्ति दोष दोश सिद्वि की दशा में वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 10 वर्ष से कम नहीं होगी, दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा

अश्लील सामग्री का भंडारण

कोई व्यक्ति जो वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए बालक को सम्मलित करते हुए किसी अश्लील सामग्री का किसी भी रूप में भंदार्करण करेगा, वह किसी भांति के कारावास से जो 3 वर्ष तक हो सकेगा या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा।

पोक्सो एक्ट 2012 की परिभाषा के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति नाबालिग है। यह अधिनियम बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों की पूर्ण एवं व्यापक रूप से पहचान करता है। यह प्रत्येक स्तर पर सभी बातों पर ध्यान देता है ताकि बच्चे के स्वास्थ्य, भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक, मानसिक एवं बौद्विक विकास सुनिश्चित किया जा सके।

बालिकाओं के साथ बढती दरिंदगी को देखते हुए, इस एक्ट में बदलाव किया गया, जिसके तहत अब 12 साल तक की बच्ची से रेप के दोषियों को मौत की सजा मिलेगी। सरकार के द्वारा रखे इस प्रस्ताव को अप्रैल 2018 में कैबिनेट द्वारा मंजूरी मिल गयी है । यदि अभियुक्त एक किशोर है, तो उसके ऊपर मुकदमा किशोर न्यायलय अधिनियम, 2000 (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) में मुकदमा चलाया जायेगा। यदि पीड़ित बच्चा विकलांग है या मानसिक रूप या शारीरिक रूप से बीमार है, तो विशेष अदालत को उसकी गवाही को रिकॉर्ड करने या किसी अन्य उद्देश्य के लिए अनुवादक, दुभाषिया या विशेष शिक्षक की सहायता ली जा सकती है। यदि अपराधी ने कुछ ऐसा अपराध किया है जो कि बाल अपराध कानून के अलावा अन्य कानून में भी अपराध है तो अपराधी को सजा उस कानून के तहत होगी जो सबसे सख्त हो। यदि कोई पुलिस, वकील, सरकारी अधिकारी जिनके संरक्षण में बच्चा हो, अगर वो इस तरह की घटना में अभियुक्त पाया जाता है तो उसके लिए भी दंड का प्रावधान।

किशोर न्याय ( बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015- सर्वप्रथम किशोर न्याय अधिनियम 1986 में अस्तित्व में आया, जिसे देश भर में सन 2000 से लागू किया गया। इसमें सन 2006 व 2011 में कुछ संशोधन किये गए। सन 2015 में इस कानून में व्यापक परिवर्तन किये गए और यह एक नए स्वरुप में लागू किया गया। इस कानून में 112 धाराएं हैं एवं इसे 10 अध्यायों में विभाजित किया गया है। सन 2016 में इसकी नियमावली बनायीं गयी।

विशेष किशोर पुलिस इकाई एवं बाल संरक्षण पुलिस अधिकारी के कार्य

इस कानून के अंतर्गत हर जिले में विशेष किशोर पुलिस इकाई (स्पेशल जुविनाइल पुलिस यूनिट- एस. जे.पी.ओ.) का गठन किया गया है । प्रत्येक जिले में गठित एस.जे.पी.यू एवं प्रत्येक थाने में नियुक्त बाल कल्याण पुलिस अधिकारी (सी.डब्लू.पी.ओ.) से यह अपेक्षित है कि बच्चों के मामलों को अविलम्ब एवं उनके सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए कार्य करें ।

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