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नवीन राज्यों का उदय

कारण

18वीं सदी में मुगल साम्राज्य की शिथिलता से राजनैतिक शून्य स्थिति

मुगल सूबेदारों एवं प्रादेशिक सरदारों की अर्द्ध स्वतंत्र अथवा स्वतंत्र राज्य बनाने की महत्वकांक्षा - बंगाल, अवध, हैदराबाद, मैसूर आदि।

मुगल शासन के खिलाफ स्थानीय सरदारों, जमींदारों तथा किसानों का विद्रोह एवं स्वतंत्र राज्यों की स्थापना - मराठा, अफगान, पंजाब एवं जाट आदि।

सुदूरवर्ती क्षेत्रों में मुगल प्रभाव का अभाव।

हैदराबाद

हैदराबाद के आसफजाही वंश का प्रवर्तक चिनकिलिच खां (निजामुल मुल्क) था।

दक्कन में स्वतंत्र राज्य की पहली बार कोशिश करने वाला जुल्फिकार खां था।(1708 ई. में)

1713 ई. में जुल्फिकार खां के बाद निजामुल मुल्क दक्कन का वायसरा बना।

1715 ई. में सैय्यद हुसैन अली को दक्कन का वायसराय बनाया गया।

हुसैन अली की मृत्यु के बाद पुनः चिनकिलिच खां दक्कन का सूबेदार बना।

सकूरखेडा युद्धा (अक्टूबर, 1724)

पृष्ठभूमि: मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने मुबारिज खां को दक्कन का वायसराय बनाया और आदेश दिया कि वह चिनकिलिच खां (निजामुल मुल्क) को जीवित अथवा मृत सम्राट के सम्मुख उपस्थित करे।

युद्ध: सकूरखेडा का युद्ध मुबारिज खां एवं निजामुल मुल्क के बीच लड़ा गया जिसमें मुबारिज खां मारा गया एवं निजाम दक्कन का स्वामी बन गया।

परिणाम: सम्राट ने विवश होकर निजामुल मुल्क को दक्कन का वायसराय नियुक्त कर दिया एवं आसफजाह की उपाधि प्रदान की।

इस प्रकार निजामुल मुल्क आसफजाह ने 1724 ई. में हैदराबाद राज्य की स्थापना की।

अवध

अवध के स्वतंत्र राज्य की स्थापना सआदत खां (बुरहान मुल्क) ने की।

अवध के स्वतंत्र राज्य के निर्माण के समय मुगल सम्राट मुहम्मद शाह था।

अवध में नया राजस्व बंदोबस्त करने वाला नवाब सआदत खां था।

अबुल मंसूर/सफदर जंग, मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के फरमान से अवध का नवाब नियुक्त हुआ।

सफदर जंग ने अहमद शाह अब्दाली और मुगलों के बीच लड़े गये युद्ध में मुगलों का साथ दिया था।

सफदरजंग की सेना में सर्वोच्च पद पर एक हिन्दु नवाब राय था।

अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने मुगल बादशाह शाह आलम-II (अली गौहर) को लखनऊ में शरण दी।

पानीपत के तीसरे युद्ध में शुजाउद्दौला ने अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया।

बक्सर के युद्ध (1764 ई.) में अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अंग्रेजों के खिलाफ बंगाल के अपदस्थ नवाब मीरकासिम तथा मुगल सम्राट शाह आलम-II का साथ दिया।

बनारस की संधि (1773 ई.)

यह संधि अवध के नवाब शुजाउद्दौला एवं वारेन हेस्टिंग्स के बीच हुई।

इस संधि के द्वारा इलाहबाद एवं कडा जिले अंग्रेजों द्वारा अवध के नवाब को 50 लाख रूपये में बेचे गये।

फैजाबाद की संधि (1775 ई.)

बनारस पर अंग्रेजी सर्वोच्चता स्थापित हो गयी।

वारेन हेस्टिंग ने अवध की बेगमों की संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी दी।

नवाब आसफुद्दौला ने लखनऊ में सन 1784 में बड़े इमामबाड़े का निर्माण कराया था। इसमें विश्व प्रसिद्ध भूलभुलैया भी मौजूद है।

लार्ड बेलेजली से सहायक संधि करने वाला अवध का नवाब सआदत अली खां था। (1801 ई. में संधि की)

गाजीउद्दीन हैदर अली खां को वारेन हेस्टिंग्स ने 1815 ई. में बादशाह की उपाधि प्रदान की।

अवध का अंतिम नवाब वाजिद अली शाह था।

1854 ई. में आउट्रम की रिपोर्ट के आधार पर लार्ड डलहौजी ने अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर ब्रिटिश सम्राज्य में मिला दिया।

जाट

जाट दिल्ली, आगरा एवं मथुरा के आस पास के इलाकों (आगरा, मथुरा, मेरठ, अलीगढ़) में रहने वाले खेती करने वाले लोग थे।

सर्वप्रथम मथुरा के आसपास 1669 ई. में गोकुल नाम के किसान ने विद्रोह किया फिर 1688 ई. में जमींदार राजाराम के नेतृत्व में विद्रोह हुआ।

चूडामन ने भरतपुर राज्य की नींव डाली बाद में बदनसिंह ने राज्य को सुदृढ़ किया।

जाट सत्ता महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में उच्चतम गरिमा पर पहुंच गयी।

लेाहगढ़ किला, भरतपुर

लोहगढ़ किले का निर्माण 1733 ई. में जाट महाराजा सूरजमल ने करवाया।

लोहगढ़ किले को भारत का एकमात्र अजेय दुर्ग कहा जाता है इस दुर्ग को अंग्रेज, मुगल, मराठा एवं राजपूत कोई नहीं जीत पाया।

लोहगढ़ किले में मुगलों से जीतकर लाया हुआ अष्टधातु का दरवाजा लगा है। इस दरवाजे को जाट महाराजा जवाहर सिंह द्वारा लगवाया गया।

अष्टधातु के दरवाजे का इतिहास

कर्नल जेम्स टाॅड के अनुसार इसका वजन 20 टन था।

मूल रूप से यह दरवाजा चित्तौड़गढ़ के किले में लगा हुआ था परन्तु अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़गढ़ आक्रमण के बाद इस दरवाजे को चित्तौड़ से उखाड़ कर दिल्ली के लाले किले में लगा दिया गया।

सन् 1765 ई. में भरतपुर के महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली के शासक नजीबुद्दौला को पराजित किया एवं दरवाजे को उखाड़ कर भरतपुर ले आए।

महाराजा सूरजमल को जाटों का आफलातून(प्लेटो) कहा जाता है।

अहमदशाह अब्दाली ने जाट राजा बदनसिंह को राज की उपाधि दी जो बाद में महेंद्र राज कहलाए।

1805 ई. में रणधीर सिंह ने अंग्रेजों की सत्ता स्वीकार कर ली एवं अंग्रेजों की अधीनता को स्वीकार किया।

पंजाब

पंजाब में सिख धर्म की शुरूआत गुरू नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में की।

सिख धर्म में कुल 10 गुरू हुए हैं।

गुरूनानक देव जी इब्राहिम लोदी के समकालीन थे इन्होंने नानक पंथ की स्थापना की।

गुरू अंगद देव जी ने गुरूमुखी लिपि का आविष्कार किया।

गुरू रामदास जी अकबर के समकालीन थे। अकबर ने गुरू रामदास जी के लिए 500 बीघा जमीन प्रदान की। इसी भूमि पर गुरू रामदास ने रामदासपुर नगर बसाया जो बाद में अमृतसर नामक शहर के रूप में जाना गया।

गुरू अर्जुनदेव जी ने रामदासपुर में अमृतसर नामक तालाब का निर्माण करवाया एवं इस तालाब में हरमंदिर साहब गुरूद्वारे का निर्माण करवाया।

गुरू अर्जुनदेव जी ने तरन तारन, करतारपुर एवं गोविन्दपुर नामक शहर बसाए।

गुरू अर्जुनदेव जी ने सिखों के आदिग्रंथ की रचना की।

सिखों को लडाकू जाति के रूप में परिवर्तन करने का कार्य गुरू हर गोविन्द सिंह जी ने शुरू किया तथा गुरू गोविन्द सिंह जी के नेतृत्व में सिख खालसा पंथ की स्थापना हुई एवं सिख राजनैतिक एवं फौजी ताकत बने।

सिखों के दसवें गुरू गोविन्द सिंह जी ने आनन्दपुर नगर बसाया।

गुरू गोविन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। गुरु गोविंद सिंह जी ने पांचवे गुरु अर्जुन देव जी द्वारा स्थापित “गुरु ग्रंथ साहिब” को ही अगला गुरु बताया। इनकी हत्या महाराष्ट्र के नांदेड नामक स्थान पर अजीम खान पठान द्वारा की गयी।

सिख धर्म के 10 गुरुओं के नाम

  1. गुरु नानक देव जी (1469-1539)
  2. गुरु अंगद देव जी (1539-1552)
  3. गुरु अमर दास जी (1552-1574)
  4. गुरु राम दास जी (1574-1581)
  5. गुरु अर्जुन देव जी (1581-1606)
  6. गुरु हरगोविंद जी (1606-1644)
  7. गुरु हर राय जी (1644-1661 )
  8. गुरु हरकिशन जी (1661-1664)
  9. गुरु तेग बहादुर जी (1664-1675)
  10. गुरु गोविंद सिंह जी (1675-1708)

सिखों का प्रथम राजनैतिक नेता बंदा बहादुर/लक्ष्मण देव/माधवदास था।

बंदा बहादुर ने प्रथम सिख राज्य की स्थापना की।

18वीं सदी में पंजाब छोटे-छोटे सिख राज्यों में बंटा हुआ था इन राज्यों को मिसल कहा जाता था। पंजाब में 12 मिसल थे।

महाराजा रणजीत सिंह

रणजीत सिंह सुकरचकिया मिसल में जन्मे थे। इनके पिता का नाम महासिंह था।

आधुनिक पंजाब के निर्माण का श्रेय सुकरचकिया मिसल को दिया जाता है।

रणजीत सिंह ने 1799 में लाहौर और 1802 में अमृतसर पर कब्जा किया बाद में कश्मीर, पेशावर एवं मुल्तान को भी जीत लिया।

रणजीत सिंह ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया।

1808 ई. में रणजीत सिंह ने सतलज के पार फरीदकोट, मुलेर कोटल एवं अम्बाला पर कब्जा कर लिया।

अमृतसर की संधि (1809 ई.)

अमृतसर की संधि चाल्र्स मेटकाॅफ एवं रणजीत सिंह के बीच 1809 ई. में हुई।

संधि के अनुसार, रणजीत सिंह के सतलज नदी के पूर्वी तट पर विस्तार को सीमित कर दिया गया किन्तु उत्तर में राज्य विस्तार कर सकता था।

रणजीत सिंह ने 1818 में मुल्तान, 1819 ई. में कश्मीर एवं 1823 ई. में पेशावर पर अधिकार कर लिया।

काबुल के शासक जमनशाह ने रणजीत सिंह को राजा की उपाधि प्रदान की थी।

1809 ई. में रणजीत सिंह ने लाहौर के अपदस्थ शासक शाहशुजा को पुनः सत्तासीन करने में सहायता दी। इसी सहायता के बदले शाहशुजा ने रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा दिया जिसे नादिरशाह लाल किले से लूट कर ले गया था।

रणजीत सिंह भारत के ऐसे प्रथम शासक थे जिन्होंने अंग्रेजों से सहायक संधि को स्वीकार नहीं किया।

फ्रांसीसी यात्री विक्टर जैक्वीमो ने रणजीत सिंह की तुलना नेपोलियन बोनापार्ट से की थी।

रणजीत सिंह का प्रशासन

रणजीत सिंह ने ब्रिटिश एवं फ्रांसीसी सैन्य व्यवस्था के आधार पर कुशल, प्रशिक्षित एवं सुसंगठित सेना का गठन किया।

रणजीत सिंह की स्थायी सेना को फौज-ए-आइन नाम से जाना जाता था। इनकी सेना एशिया में दूसरे स्थान पर थी। (प्रथम: ईस्ट इंडिया कंपनी)

रणजीत सिंह ने लाहौर में तोपखाने का निमार्ण करवाया।

रणजीत सिंह की सरकार को सरकार ए खालसा नाम दिया। इन्होंने नानक शाही सिक्के चलाए।

प्रथम आंग्ल-सख युद्ध (1845-46)

इस समय पंजाब का शासक रणजीत सिंह का अल्पायु पुत्र दिलीप सिंह था।

इस समय भारत में गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिग्ज था।

प्रथम आंग्ल सिख युद्ध में पंजाब की सेना (सिख सेना) का नेतृत्व लाल सिंह एवं अंग्रेजी सेना का नेतृत्व लार्ड ह्यूगफ ने किया।

इस युद्ध में सिख सेना पराजित हुई तथा अंग्रेजों के साथ 8 मार्च, 1846 ई. में लाहौर की संधि हुई।

अंग्रेजों ने 50,000 रू में कश्मीर को गुलाब सिंह को बेच दिया।

द्वितीय आंग्ल सिख युद्ध (1848-49)

इस समय पंजाब का शासक दिलीप सिंह था एवं भारत का गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी था।

सिख सेना का नेतृत्व शेर सिंह ने किया।

1. रामनगर की लडाई: अंग्रेजों का नेतृत्व जनरल गाॅफ ने किया। यह युद्ध अनिर्णायक रहा।

2. चिलियांवाला की लड़ाई: अंग्रेजों का नेतृत्व जनरल गाॅफ ने किया। यह युद्ध अनिर्णायक रहा।

3. गुजरात की लड़ाई: यह युद्ध ‘तोपों के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। इसमें अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर चाल्र्स नेपियर ने किया।

यह युद्ध पूर्णतः निर्णायक था। इस युद्ध से पंजाब राज्य की शक्ति समाप्त हो गयी एवं पंजाब पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

मैसूर

18वीं सदी में मैसूर में चिक्का कृष्ण राज का शासन था परन्तु यह कठपुतली मात्र राजा था। वास्तविक शक्ति इसके दो मंत्रियों नंजराज एवं देवराज के हाथ में थी।

हैदरअली

1721 में मैसूर के कोलार में जन्मा हैदरअली मैसूर की सेना में एक साधारण अधिकारी था बाद में हैदर अली को डिंडीगुल का फौजदार नियुक्त किया गया।

हैदरअली ने डिंडीगुल में फ्रांसीसियों के सहयोग से शस्त्रगार की स्थापना की। (1755 ई. में)

1761 तक हैदरअली के पास मैसूर की समस्त शक्ति केन्द्रित हो गयी।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-69 ई.)

यह युद्ध अंग्रेजों एवं हैदरअली, मराठा और निजाम की संयुक्त सेना के बीच हुआ।

इसमें निजाम अंग्रेजों से मिल गया।

हैदरअली ने अंग्रेजों को मंगलोर में पराजित किया।

युद्ध समाप्ति के बाद 1769 ई. में मद्रास की संधि हुई।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84 ई.)

हैदरअली ने पुनः अंग्रेजों के विरूद्ध मराठों एवं निजाम से संधि कर ली।

1780 में हैदरअली के कर्नाटक पर आक्रमण कर द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की शुरूआत की एवं अंग्रेज जनरल बेंली को परास्त किया।

1781 ई. में हैदरअली एवं आयरकूट के बीच पोर्टोनोवा का युद्ध हुआ जिसमें हैदरअली की हार हुई।

1782 ई. में हैदरअली ने पुनः अंग्रेजी सेना को परास्त किया परन्तु युद्ध में घायल हो जाने से 7 दिसम्बर, 1782 ई. में हैदरअली की मृत्यु हो गयी।

हैदरअली की मृत्यु के बाद 1784 तक हैदरअली के पुत्र टीपू ने युद्ध जारी रखा।

1784 ई. में मंगलोर की संधि से युद्ध समाप्त हुआ।

टीपू सुल्तान (1782-1799 ई.)

हैदरअली की मृत्यु के बाद 1782 ई. में उसका पुत्र टीपू गद्दी पर बैठा।

टीपू ने सुल्तान की उपाधि धारण की।

टीपू ने नई मुद्रा, नई माप तौल की इकाई एवं नवीन संवत् शुरू किया।

टीपू ने जारी सिक्कों पर हिन्दु देवी-देवताओं के चित्र अंकित करवाए एवं वर्ष व माह अंकित करवाने के लिए अरबी भाषा का प्रयोग किया।

टीपू प्रथम भारतीय शासक था जिसने अपना प्रशासन यूरोपीय प्रशासन के आधार पर निर्मित किया।

फ्रांसीसी सैनिकों के अनुरोध पर श्रीरंगपट्टनम् में जैकोबिन क्लब की स्थापना में सहयोग किया एवं स्वयं इसका सदस्य बना।

टीपू ने मैसूर एवं फ्रांसीसी मित्रता का प्रतीक स्वतंत्रता वृक्ष लगाया।

टीपू ने विदेशी राज्यों से मैत्री संबंध स्थापित करने के लिए अरब, काबुल, फ्रांस, तुर्की कुस्तुंतुनिया एवं माॅरीशस को अपना दूतमण्डल भेजा।

टीपू ने 1796 ई. में नौसेना बोर्ड का गठन किया।

टीपू ने मंगलोर, मोलीदाबाद, दाजिदाबाद में डाॅक यार्ड का निर्माण करवाया।

तृतीय आंग्ला-मैसूर युद्ध (1790-92)

यह युद्ध अंग्रेज, निजाम व मराठों की संयुक्त सेना व टीपू के मध्य लड़ा गया।

अंग्रेजी सेना का नेतृत्व मजबूत था परिणामस्वरूप टीपू पराजित हुआ।

1792 ई. में टीपू एवं अंग्रेजों के बीच श्री रंगपट्टनम की संधि हुई।

चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध (1799 ई.)

अंग्रेजों ने पुनः निजाम एवं मराठों से संधि कर ली। अंग्रेज सेना का नेतृत्व वैलेजली हैरिस और स्टुअर्ट ने किया।

4 मई, 1799 ई. को टीपू युद्ध में मारा गया एवं मैसूर की गद्दी पर आड्यार वंश के बालक कृष्ण राय को बिठा दिया गया।

मैसूर विजय की खुशी में आयरलैण्ड के लार्ड समाज में वैलेजली को माकर््िवस की उपाधि दी गयी।

तथ्य

सर मोक्षगुण्डम विश्वेसरैया (एम. विश्वेसरैया) को आधुनिक मैसूर का पिता कहा जाता है।

बंगाल

1701 ई. में औरंगजेब ने मुर्शीद कुली खां को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया।

मुर्शीदकुली खां बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा का सुबेदार था।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद बंगाल मुर्शीदकुली खां के नेतृत्व में पूर्ण स्वतंत्र राज्य हो गया।

1704 ई. में मुर्शीकुली खां ने बंगाल की राजधानी को ढ़ाका से मुर्शिदाबाद हस्तांतरित किया।

मुर्शीद को बंगाल में नयी जमींदारी पर आधारित ‘कुलीन वर्ग’ का जनक माना जाता है।

मुर्शीद कुली खां ने भूमि बन्दोबस्त में इजारेदारी प्रथा प्रारंभ की।

सिराज-उद्-दौला (1756-57 ई.)

राजगद्दी के प्रतिद्वन्दी: शौकत जंग, घसीटी बेगम, मीर जाफर

घसीटी बेगम को बंदी बनाया।

मीर जाफर को सेनापति पद से हटाकर मीर मदान को सेनापति बनाया।

मनिहारी का युद्ध (1756 ई.) में शौकत जंग को हराया।

ब्लैक होल घटना (20 जून, 1756)

हालवेल के अनुसार, सिराज ने 20 जून की रात 146 अंग्रेज बंदियों को 18 फुट लंबी एवं 14 फुट 10 ईच चौड़ी कोठरी में बन्द कर दिया था। अगले दिन जब देखा तो हालवेल सहित 23 व्यक्ति ही जिन्दा ही बचे थे। अंग्रेज इतिहासरों ने इस घटना को ब्लैक हाॅल त्रासदी कहा है।

प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757 ई.)

प्लासी का युद्ध अंग्रेज सेना एवं बंगाल के नवाब सिराजउद्दौला के बीच हुआ।

अंग्रेज सेना का नेतृत्व क्लाइव ने किया था। नवाब की सेना का नेतृत्व मीर जाफर, यारलतीफ खां एवं राय दुर्लभ ने किया।

नवाब की सेना के नेतृत्वकर्ता राजद्रोही थे जो अंग्रेजों से मिले हुए थे। इन्होंने युद्ध में कोई भूमिका नहीं निभाई।

नवाब की सेना के वफादार सिपाही मीर मदान और मोहन लाल युद्ध में लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए।

सिराज-उद्-दौला की भी हत्या कर दी गयी।

षड़यंत्र के मुताबिक युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों ने 28 जून, 1757 को मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया।

मीर जाफर (1757-60 ई.)

मीर जाफर के समय से बंगाल में कंपनी किंग मेकर की भूमिका निभाने लगी।

बंगाल की नवाबी प्राप्त करने के उपलक्ष्य में मीर जाफर ने कंपनी को ‘24 परगना’ की जमींदारी प्रदान की एवं अंग्रेजों को अनेक पुरस्कार प्रदान किए।

1760 ई. में मीर जाफर ने अपने दामाद मीर कासिम के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया।

मीर कासिम (1760-63 ई.)

मीर कासिम ने राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर हस्तांतरित की।

मीर कासिम ने राजस्व प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने का प्रयास किया।

मीर कासिम ने सैनिकों की संख्या में वृद्धि कर यूरोपीय ढ़ंग से प्रशिक्षित किया।

मीर कासिम ने आंतरिक व्यापार पर सभी प्रकार के शुल्कों की वसुली बंद करवा दी।

जुलाई 1763 ई. में कंपनी ने मीर कासिम को अपदस्थ कर मीर जाफर को पुनः नवाब बना दिया।

बक्सर का युद्ध (1764 ई.)

यह युद्ध अंग्रेजी सेना एवं मीर कासिम, शाह आलम 2 और शुजाउद्दौला की संयुक्त सेना के बीच हुआ।

अंग्रेजी सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।

23 अक्टूबर, 1764 ई. को युद्ध प्रारंभ हुआ।

युद्ध में अंग्रेजों की जीत हुई परिणाम स्वरूप बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा पर कंपनी का पूर्ण प्रभुत्व स्थापित हो गया। अवध अंग्रेजों का कृपा पात्र बन गया।

5 फरवरी, 1765 ई. में मीर जाफर की मृत्यु के बाद कंपनी ने उसके पुत्र नज्मुद्दौला को अपने संरक्षण में नवाब बनाया।

बंगाल में द्वैध शासन

द्वैध शासन का जनक लियोनिल कार्टिस को माना जाता है।

बंगाल में द्वैध शासन की शुरूआत 1765 ई. में हुई।

द्वैध शासन के अंतर्गत कंपनी दीवानी एवं निजामत के कार्यों का निष्पादन भारतीय के माध्यम से करती थी जबकि वास्तविक सत्ता कंपनी के पास थी।

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