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सांभर का चौहान वंश

चौहानों की उत्पति के संबंध में विभिन्न मत हैं। पृथ्वीराज रासौ(चंद्र बरदाई) में इन्हें ‘अग्निकुण्ड’ से उत्पन्न बताया गया है, जो ऋषि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ से उत्पन्न हुए चार राजपूत - प्रतिहार, परमार,चालुक्य एवं चौहानों(हार मार चाचो - क्रम) में से एक थे। मुहणोत नैणसी एवं सूर्यमल मिश्रण ने भी इस मत का समर्थन किया है। प. गौरीशंकर ओझा चौहानों को सूर्यवंशी मानते हैं। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार चौहानों की उत्पत्ति ब्राह्मण वंश से हुई है।

राजस्थान में चौहानों के मूल स्थान सांभर(शाकम्भरी देवी - तीर्थों की नानी,देवयानी तीर्थ) के आसपास वाला क्षेत्र माना जाता था, इस क्षेत्र को सपादलक्ष(सपादलक्ष का अर्थ सवा लाख गांवों का समूह) के नाम से जानते थे, प्रारम्भिक चौहान राजाओं की राजधानी अहिच्छत्रपुर (हर्षनाथ की प्रशस्ति) थी जिसे वर्तमान में नागौर के नाम से जानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार सांभर इनकी राजधानी थी। यहीं पर वासुदेव चौहान ने चौहान वंश की नीव डाली। इसने सांभर(सांभर झील के चारों ओर रहने के कारण चौहान कहलाये) को अपनी राजधानी बनाया। सांभर झील का निर्माण(बिजोलिया शिलालेख के अनुसार) भी इसी शासक ने करवाया। इसकी उपाधि महाराज की थी। अतः यह एक सामंत शासक था। वासुदेव के उत्तराधिकारी "गुवक प्रथम' ने सीकर में हर्षनाथ मंदिर को निर्माण कराया इस मंदिर मे भगवान शंकर की प्रतिमा विराजमान है, जिन्हें श्रीहर्ष के रूप में पूजा जाता है।

गूवक प्रथम के बाद गंगा के उपनाम से विग्रहराज द्वितीय को जाना जाता है सर्वप्रथम विग्रहराज द्वितीय ने भरूच (गुजरात) के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को पराजित किया तथा भरूच गुजरात में ही आशापुरा देवी के मंदिर का निर्माण कराया इस कारण विग्रहराज द्वितीय को मतंगा शासक कहा गया इस शासक की जानकारी का एकमात्र स्त्रोत सीकर से प्राप्त हर्षनाथ का शिलालेख है, जो संभवतयः 973ई. का है।

इस वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक पृथ्वीराज प्रथम था जिसकी उपाधि महाराजाधिराज थी। पृथ्वीराज प्रथम के मंत्री हट्ड ने सीकर में जीण माता के मंदिर का निर्माण करवाया।

अजयराज

पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र का नाम अजयराज था। अजयराज को चाँदी के सिक्कों पर 'श्री अजयदेव' के रूप में प्रदर्शित किया गया था, अजयराज की रानी सोमलेखा के भी हमें सिक्के प्राप्त हुए हैं, इससे ज्ञात होता है कि सोमलेखा ने भी अपने नाम के चाँदी के सिक्के चलवाए। अजयराज ने 1113ई. में अजयमेरू दुर्ग का निर्माण कराया, इस दुर्ग को पूर्व का जिब्राल्टर कहा जाता है। तथा अजमेर को अपनी राजधानी के रूप में स्वीकार किया मेवाड़ के शासक पृथ्वीराज ने अपनी रानी तारा के नाम पर अजयमेरू दुर्ग का नाम तारागढ़ दुर्ग रखा बाद में यही अजयमेरू/तारागढ़/ गढ़बीठली के रूप में जाना जाने लगा अजयराज ने इस दुर्ग का निर्माण अजमेर की बीठली पहाड़ी पर कराया था जिसे कारण इसे गढ़बीठली कहा गया। अजयराज की उपलब्धि यह थी कि इसने चौहानों को एक संगठित भू-भाग प्रदान किया जिसे अजमेर के नाम से जाना गया है।

अजयराज के पुत्र अर्णोराज/अर्णाराज(आनाजी)

इस शासक ने सर्वप्रथम तुर्कों को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, तुर्कों पर विजय के उपलक्ष्य में अर्णोराज ने अजमेर शहर के बीचां-बीच अनासागर झील का निर्माण(1137 ई.) कराया था। जयानक ने अपने ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय में लिखा है कि "अजमेर को तुर्कों के रक्त से शुद्ध करने के लिए आनासागर झील का निर्माण कराया था' क्योंकि इस विजय में तुर्का का अपार खून बहा था। जहांगीर ने यहां दौलत बाग का निर्माण करवाया। जिसे शाही बाग कहा जाता था। जिसे अब सुभाष उद्यान कहा जाता है। इस उद्यान में नूरजहां की मां अस्मत बेगम ने गुलाब के इत्र का आविष्कार किया। शाहजहां ने इसी उद्यान में पांच बारहदरी का निर्माण करवाया।

अर्णांराज ने पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया था। गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल ने अर्णाराज पर आक्रमण किया लेकिन इस आक्रमण को अर्णोराज ने विफल कर दिया यह जानकारी हमें मेरूतुंग के प्रबंध चिन्तामणि नामक ग्रन्थ से मिलती है। अर्णोराज के पुत्र जगदेव ने इनकी हत्या कर दी इस कारण इसे चौहानों का पित्हंता भी कहा जाता है।

विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) (1153-1164 ई.)

पृथ्वी राज तृतीय के अतिरिक्त चौहान वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक विग्रहराज चतुर्थ हुआ। इनके काल को चौहानों का स्वर्ण काल भी कहा जाता है। सर्वप्रथम विग्रहराज ने तोमारों को परास्त कर दिल्ली के आसपास वाले भू-भाग पर अधिकार किया इस प्रकार चौहानों के हाथ में पहली बार दिल्ली का राज्य आया, इस कारण विग्रहराज चतुर्थ को 'कटिबंधु' के नाम से भी जाना जाता था। इसने पंजाब की भाण्डान को पराजित कर दूर भगा दिया। यह एक कवि हृदय शासक था। इसे कवि बांधव भी कहा जाता है। इसने स्वयं ने हरकेलि (नाटक) की रचना की। जिसमें शिव-पार्वती व कुमार कार्तिकेय का वर्णन है। इसके दरबारी कवि नरपति नाल्ह ने बीसलदेव रासो ग्रन्थ की रचना की। अन्य कवि सोमदेव ने ललित विग्रहराज की रचना की। 1153 से 1156 के मध्य विग्रहराज ने अजमेर में एक संस्कृत विद्यालय का निर्माण करवाया जिसे 1200 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुडवाकर उसके स्थान पर ढाई दिन का झोपडा बनवाया।

यहां पर पंजाब शाह नामक सुफीसंत का ढाई दिन का उर्स भरता था इसी कारण इसे ढाई दिन का झोपडा कहते है।

टोंक के बीसलपुर कस्बे में बीसलपुर बांध का निर्माण करवाया। विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव प्रथम शासक था जिसने पशु हत्या पर प्रतिबंध लगाया था।

वासुदेव चौहान विग्रहराज → द्वितीय(मतंगा की उपाधि) → अजयराज(श्री अजयदेव के नाम से चांदी के सिक्के चलाएं) →पत्नी - सोमलेखा → अर्णोराज विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) → पृथ्वीराज तृतीय

पृथ्वीराज तृतीय(1177-1192)

जन्म 1166 ई.(वि.स.1223) अहिलपाटन (गुजरात)

उपनाम- रायपिथौरा, दलपुगल की उपाधि धारण की

माता - कर्पूरी देवी

प्रधानमंत्री- कदम्बास (केमास)

पिता - सोमेश्वर

खाण्डेराव पृथ्वीराज का सेनापति

चौहान वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली व प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज तृतीय था। 1178 ई. में पिता सोमेश्वर की मृत्यु के पश्चात् पृथ्वीराज अजमेर का शासक बना। वह छोटी आयु(11 वर्ष ) का था। अतः उसकी माता कर्पूरी देवी व प्रधानमंत्री केमास ने प्रशासन का कार्यभार सम्भाला।

1182 ई. में पृथ्वीराज ने भरतपुर-मथुरा क्षेत्र में भण्डानकों के विद्रोह का अंत किया।

1182 ई. में युवा हाने के पश्चात् पृथ्वीराज ने महोबा के चंदेल वंश के शासक परमाल(परमार्दी) देव पर आक्रमण किया। इस युद्ध(तुमुल का युद्ध) में परमार्दिदेव के दो सेनानायक आल्हा व उदल वीरगति को प्राप्त हुए।

नागौर युद्ध (1184)

(गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय व पृथ्वीराज चौहान के बीच)

गुजरात के शासक, भीमदेव व पृथ्वीराज तृतीय के मध्य आबू की राजकुमारी इच्छनी को प्राप्त करने के लिए युद्ध हुआ और दोनो के मध्य संधि हो गई। दोनो ने इच्छीनी से विवाह नहीं किया। अतः इच्छनी के पिता ने उसे जहर दे दिया।

पृथ्वीराज के नाना अनंगपाल तोमर ने दिल्ली की स्थापना की । अनंगपाल निसंतान था। अतः उसने अपना राज्य पृथ्वीराज को दे दिया। अब पृथ्वीराज ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। पृथ्वीराज व तूर्की शासक मोहम्मद गौरी की राज्य सीमाएं स्पर्श करने लगी। दोनों के मध्य तराइन के दो युद्ध हुए। तराइन के दोनों युद्धों का विस्तृत विवरण कवि चन्द्र बरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ हसन निजामी के ‘ताजुल मासिर’ एवं सिराज के तबकात ए नासिरी में मिलता है।

तराइन का प्रथम युद्ध (1191)

इस युद्ध में पुथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को पराजित कर दिया।

तराइन का द्वितीय युद्ध (1192)

तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास की एक निर्णायक एवं युग परिवर्तनकारी घटना साबित हुआ। तराइन के इस युद्ध में गौरी ने पृथ्वीराज को पराजित कर उसकी हत्या कर दी और उसके पुत्र गोविन्द को राणथम्भौर का राज्य दे दिया।

उसके पश्चात मुहम्मद गौरी ने कन्नौज नरेश जयचंद्र को भी हराया और मार डाला। आपसी द्वेष के कारण उन दोनों की हार और मृत्यु हुई।

पृथ्वीराज के दरबार में पृथ्वीराज विजय का लेखक ‘जयानक’ और पृथ्वीराज रासो के लेखक एवं मित्र चंद्र बरदाई, विद्यापति गौड़, वागीश्वर जनार्दन तथा विश्वरूप आदि विद्वान थे।

चन्द्रबरदाई ने पृथ्वीराज रासो की रचना की, रासो का पिछला भाग चन्द्रबरदाई के पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया। पृथ्वीराज रासो की भाषा पिंगल है। साथ ही इसे हिन्दी की पहली रचना, महाकाव्य होने का सम्मान प्राप्त है।

पृथ्वीराज रासों के अनुसार नेत्रहीन पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण चलाकर मोहम्मद गौरी की हत्या की। चन्द्रबरदाई ने इस संबंधमें पृथ्वीराज को दोहा सुनाया -

चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
तां ऊपर सुल्तान है, मत चूकै चौहान।।

पृथ्वीराज तृतीय और कन्नौज के शासक जयचन्द गहडवाल की पुत्री संयोगिता के मध्य प्रेम इतिहास में प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध सूफी संत और चिश्ती सम्प्रदाय से संबंधित ख्वाजा मुइनूद्दीन चिश्ती पृथ्वीराज तृतीय के समय अजमेर आये। अजमेर में इनकी दरगाह का निर्माण रजिया के पिता इल्तुतमिश ने करवाया।

देहलीवाल - वे सिक्के जो पृथ्वीराज चौहान के मध्य के थे और मोहम्मद गौरी ने उसके एकतरफ अपना निशान लगवाया और दूसरी तरफ लक्ष्मी आदि देवियों के चित्र बनवाये।

तथ्य

अखिल भारतीय रावत महासभा व राज रावत राजपूत महासभा की राजधानी सर्कल सभा और प्रवासी राजस्थानियों ने दिल्ली के लाडो सराय स्थित पिथौरागढ़ प्रांगण में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की 874वीं जयंती 8 जून 2019 को धूमधाम से मनाई।

रणथम्भौर के चौहान

संस्थापक गोविन्दराज (1194 ई. में)

हम्मीर देव चौहान (1282-1301)

शासन - 19 वर्श

युद्ध लडे़ -18

विजय -17

कोटियजन यज्ञ (विश्वरूप) करवाया ।

चौहान वंश का अंतिम शासक हम्मीर देव चौहान ने अपने जीवनकाल में 18 युद्ध लडे व 17 में विजयी हुऐ। 1301 ई. में तुर्की शासक अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया इसका मुख्य कारण तूर्की के विद्रोही सैनिक मोहम्मदशाह व केहब्रु हम्मीर मास शरण में थे। तूर्की शासक ने जब उन्हे वापस मांगा तब हडी हम्मीर देव ने इनकार कर दिया। परिणाम स्वरूप (1301 ई.) में दोनों के मध्य युद्ध हुआ।

युद्ध के समय हम्मीर के दो सेनापति रणमल व रतिपाल ने विश्वासघात किया। हम्मीर देव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नि रंगदेवी ने जल जोहर किया। रणथम्भौर युद्ध में अलाउद्दीन खिलजी के साथ अमीर खुसरौ व अलाउद्दीन का छोटा भाई उलुग खां था।

हम्मीर हठ - चन्द्रशेखर

हम्मीर रासौ - जोधराज

हमीर महाकाब्य -नयनचन्द्र सूरी

हम्मीर रासों - श्शारगंधर

अजमेर दुर्ग की स्थापना - 7 वीं शताब्दी में अजयराज नें

1291 ई. में जब जलालुद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया तो हम्मीर की तैयारियों व दुर्ग की अभेघता से घबराकर यह कहकर वापस लौट गया - " ऐसे दस किलो को भी मै मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता "।

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